Thursday, April 25, 2019

महासमर का महारथीरा फ़रवरी की एक सर्द रात को श्रीनगर के

फ़रवरी की एक सर्द रात को श्रीनगर के आम लोग घने काले आसमान में उड़ते जेट फ़ाइटर की आवाज़ से जग गए थे. कई लोगों को ये आशंका हुई कि युद्ध महज एक धमाके भर की दूरी पर रह गया है.
भारत प्रशासित कश्मीर के लोग अपने यहां खाने-पीने का सामान जमा करने लगे. पेट्रोल पंप के सामने लोगों की लाइन लगने लगी तो पेट्रोल पंप पर पेट्रोल कम पड़ने लगा.
अस्पताल के डॉक्टरों को दवाइयों का भंडार रखने को कहा गया. घबराये हुए लोग अपने बगीचों में बंकर बनाने की सोचने लगे थे.
एक बड़े नेता को अब इस बात पर पछतावा हो रहा है कि उन्होंने एयरपोर्ट के पास घर खरीद लिया. उन्हें अब ये अच्छा विचार नहीं लग रहा है.
कुछ ही दिनों में भारत के लड़ाकू विमान मिराज 2000 पाकिस्तान की सीमा में दाखिल तक हो गए
भारत ने कहा कि उसके जेट विमानों ने लेज़र गाइडेड बमों से ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह के बालाकोट में चरमपंथी शिविरों को निशाना बनाया.
साल 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद ये पहला मौका था जब भारत ने नियंत्रण रेखा के उस पार जाकर हवाई हमला किया.
समझदारी यही कहती है कि परमाणु हथियार से संपन्न पड़ोसियों को सोच समझकर कदम उठाना चाहिए. लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नीति को अब खारिज कर दिया है.
इस हमले की वाहवाही करते हुए 68 वर्षीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ये हमला पुलवामा में फ़रवरी में ही भारतीय सुरक्षा बल के जवानों पर हुए घातक हमले का वाजिब और मुंहतोड़ जवाब है.
मोदी ने लोगों से ये भी कहा कि उन्होंने इस हमले के लिए सेना को खुली छूट दी थी. एक सभा में तो उन्होंने ये भी कहा, "लोगों का खून उबल रहा है." एक दूसरी सभा में उन्होंने कहा, "मेरे दिल में भी वही आग जल रही है जो आपके अंदर जल रही है."
दरअसल, कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से आपसी दुश्मनी का युद्ध क्षेत्र रहा है. दोनों पक्ष इस खूबसूरत से मुस्लिम बहुल इलाके पर अपना अपना दावा जताते हैं.
लेकिन दोनों ही देशों के पास इसके कुछ ही हिस्सों पर नियंत्रण है. दोनों ही पक्ष एक-दूसरे से ख़तरा भी महसूस करते हैं. दोनों देशों के बीच दो युद्ध और इस इलाके में एक झड़प हो चुकी है.
लेकिन इस बार भारत के हमले के पीछे पर्याप्त वजह मानी जा सकती है. इसी साल 14 फरवरी को भारत के अर्धसैनिक बलों के 78 बसों के काफिले को विस्फोटकों से भरी एक मिनी वैन ने निशाना बनाया.
भारी सुरक्षा के बीच हाइवे पर श्रीनगर से 19 किलोमीटर दूर हुए इस हमले में 46 जवानों की मौत हुई. ये इस इलाके में दशकों बाद भारत के सुरक्षा बलों पर सबसे ख़तरनाक हमला था.
पाकिस्तान से संचालित चरमपंथी समूह 'जैश-ए-मोहम्मद' ने इस हमले के बाद जिम्मेदारी ली थी.
ऐसे में मोदी की प्रतिक्रिया को इस हमले के जवाब के तौर पर देखा गया.
प्रधानमंत्री की भारतीय जनता पार्टी ने हमेशा ये कहा है कि 'राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता' उनके मूल तत्वों में शामिल है.
मोदी ने उस भाव में अपनी ताकत और अचल राष्ट्रवाद से नया उत्साह पैदा किया है. मोदी समर्थकों का मानना है कि वे अपनी बातों पर खरे उतरे और पाकिस्तान को करारा जवाब दिया है.
हालांकि सच्चाई इतनी सरल भी नहीं है, जितनी दिख रही है. हवाई हमले के 24 घंटे के भीतर पाकिस्तान ने भारत के एक लड़ाकू जेट विमान को अपने शासन वाले कश्मीर में मार गिराया और एक भारतीय पायलट को गिरफ़्तार भी कर लिया.
इसके बाद दोनों देशों पर तनाव कम करने लिएने भारती अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता गया जिससे पाकिस्तान य पायलट को रिहा करने की पेशकश की. एक दिन बाद भारतीय पायलट स्वदेश लौट आए.

Friday, April 12, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

अदालत से ज़मानत की अर्ज़ीनामंज़ूर होने की वजह से 1977 के बाद पहली बार लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में चुनाव हो रहा है. पार्टी और परिवार उनकी अनुपस्थिति कितना मिस कर रहा है?
यह सच है कि पिताजी हम लोगों से दूर हैं, लेकिन मैंने कई बार कहा है कि लालू प्रसाद सिर्फ़ एक नाम नहीं बल्कि विचारधारा हैं. उस विचार को मानने वाले लाखों- करोड़ों लोग हैं. लालू जी को वैसे सारे लोग जो सामाजिक न्याय और धर्म-निरपेक्षता में आस्था रखते हैं वो सब उन्हें चुनाव में मिस कर रहे हैं. यह बहुत महत्वपूर्ण चुनाव था. वो लोग जानते थे कि अगर लालू जी बाहर रहे तो उनका एजेंडा कामयाब नहीं हो पाएगा. संविधान और आरक्षण में छेड़छाड़ नहीं कर पाएंगे और न ही किसी दंगाई में हिम्मत होगा कि दंगा-फसाद करवा सके.
अदालत के फ़ैसले पर मैं कोई टिपण्णी नहीं कर सकता क्योंकि यह न्यायालय का विषय है, लेकिन मैं यह ज़रुर कहूँगा कि सबसे बड़ी अदालत जनता की होती है. लोगों ने मन बना रखा है लालू जी के साथ न्याय करने का. आने वाले दिनों में जो चुनाव का परिणाम आएगा उसमें आपको यह दिख जाएगा.
जिस तरह का व्यवहार उनके साथ किया जा रहा है उसको लेकर लोगों में नाराज़गी है. पिछले दिनों मुझे ही उनसे हॉस्पिटल में मिलने नहीं दिया गया. भाजपा सरकार का रवैया अमानवीय है. उन्हें उस ब्लॉक में रखा गया है जहाँ इलाज और जांच की व्यवस्था भी नहीं है. आप मुझसे उन्हें नहीं मिलने दो, लेकिन समुचित इलाज तो करो.
यह कोई मुद्दा है नहीं है और यह किसी आम आदमी की ज़िंदगी की बेहतरी से भी जुड़ा नहीं है. घर की बात है, घर में ही रहनी चाहिए. चुनाव में नेता से लेकर कार्यकर्ताओं तक की भूमिका तय रहती है. मीसा भारती चुनाव लड़ रहीं हैं और तेजप्रताप चुनाव प्रचार करने के लिए स्वतंत्र हैं.
ये सवाल हमलोगों के ख़ेमे से क्यों. आज यह बात हम नहीं कह सकते हैं. यह सवाल एनडीए के नेताओं से पूछना चाहिए. जब वहां सीट शेयरिंग की बात हो रही थी तो बिना रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा को विश्वास में लिए हुए नीतीश जी और अमित शाह ने ख़ुद ही बराबर- बराबर सीटों का बंटवारा कर लिया. उसके बाद कौन कहाँ से लड़ेगा इसकी घोषणा अगले दो- तीन दिनों में करने की ख़बर आई. इस बात को दो- ढाई महीने हो गए होंगे. उसी बीच में चिराग़ पासवान को नीतीश जी ने ज़रिया बनवाया और ट्वीट के माध्यम से प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से जनता द्वारा नोटबंदी के फायदे आदि सवाल करवाये. मतभेद वहां था हमारे यहाँ नहीं. अब चिराग़ पासवान बताएं कि नोटबंदी के क्या- क्या फायदे हुए हैं.
राजद कभी भी बिहार में 25 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ी थी. इस बार 19 सीटों पर मैदान में हैं जबकि आरएलएसपी, हम और वीआईपी को पांच और तीन- तीन सीट दी गई. जबकि उनके पास तो कैंडिडेट भी नहीं थे?
हमारे यहाँ सीटों का बंटवारा पूरी तरह तार्किक है. तार्किक तो वहां नहीं लग रहा है जहाँ 22 सिटिंग सीट से 17 पर आ गए हैं. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू अकेले चुनाव लड़ी थी और तब उसकी लगभग 30 सीटों पर ज़मानत ज़ब्त हो गई. विधानसभावार इसकी गणना करें तो कह सकते हैं कि लगभग 135 विधानसभा सीटों पर जेडीयू की ज़मानत ज़ब्त हुई थी.
ऐसी परिस्थिति में जेडीयू को 17 लोकसभा सीट देना और अपनी पांच सिटिंग सीट छोड़ देने की बात है तो ग़ैर- तार्किक रूप से सीट बंटवारा एनडीए में हुआ है. रही बात राजद की तो राज्य में हम कभी भी इतने बड़े अलायन्स में नहीं रहे हैं. यहाँ 40 लोकसभा की सीट ही है. कम सीट पर लड़ने की एक वजह यह भी रही है. हमने अपने सभी घटक दलों को सम्मान दिया है.
माले को छोड़ बाक़ी वामपंथी दलों को आप लोगों ने पूरी तरह दरकिनार कर दिया है?
वामपंथी विचारधारा की तीन मुख्य पार्टियाँ राज्य में हैं. माले को आरा की सीट पर हमलोगों ने समर्थन दिया है. इतनी विपक्षी पार्टियाँ हैं. कितनों को हम साथ रखते और हम कितने सीटों पर चुनाव लड़ते.
कहा जा रहा है कि आरा सीट माले को देने के पीछे मक़सद मीसा भारती को पाटलिपुत्र लोकसभा सीट पर फायदा पहुँचाना है?
इसका बेहतर जवाब माले के लोग ही दे सकते हैं. हमनें कभी माले के लोगों को पाटलिपुत्र सीट छोड़ने को कहा ही नहीं. आरा सीट पर हमनें उन्हें समर्थन देने का फैसला किया है और पाटलिपुत्र सीट पर कैंडिडेट नहीं देने का फैसला उनका था. कोई थोपा हुआ फैसला नहीं था. हमलोग तो चाहते थे कि वो सभी सीटों पर हमलोगों का समर्थन करें.
आपने अभी कहा कि इतने सारे लोगों को गठबंधन में जगह नहीं दी जा सकती, लेकिन कोलकाता की रैली में जो विपक्षी एकता दिखी वह कई जगहों पर बिखरती नज़र आ रही है?
वहां बिहार की 40 लोकसभा सीट की बात नहीं हो रही थी. कोलकाता की रैली राष्ट्रीय स्तर की रैली थी. कुल 543 लोकसभा सीटों की बात थी.
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