Friday, September 14, 2018

ने ताजमहल के निर्माण के दौरान काम किया

बातचीत में राव स्वीकार करते हैं कि शहर के नाले और शहर के घरों से निकल रहा कचरा ही ताज को हो रहे नुकसान का बड़ा कारण है. वो कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन ने कई दलों का गठन किया है जो कचरे के बेहतर प्रबंधन का काम कर रहे हैं. इसके अलावा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी लगाए गए हैं जो मल और गंदगी को यमुना में जाने से पहले ही साफ़ कर दें. उन्होंने कहा, “इसके अलावा आगरा को हम स्मार्ट सिटी बनाने वाले हैं जिससे ये समस्याएं हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएँ
स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव में आगरा के चारों तरफ पेड़ लगाने की बात कही गई है जिससे रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोका जा सके. ये बातें सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर विज़न डाक्यूमेंट में भी कहीं हैं.
मगर आगरा के लोग इसका विरोध कर रहे हैं. उनका मानना है कि जो शहर धरोहर मान लिया जा चुका है उसे स्मार्ट सिटी बनाना ग़लत है. ऐसा करने से वो शहर अपने धरोहर होने की पहचान खो बैठेगा. खंडेलवाल कहते हैं कि धरोहर को अगर बचा लिया जाएगा तो बाक़ी की चीज़ें भी अपने आप बच जाएँगी.
आगरा तीन हिस्सों में बँटा हुआ है– एक मुग़ल कालीन आगरा, दूसरा बृज भूमि और तीसरा ब्रिटिश आगरा. इन तीनों की अपनी अलग-अलग पहचान है. तीनों किसी न किसी धरोहर का हिस्सा हैं. इसलिए इस पूरे इलाके का संरक्षण अपने आप में बड़ी चुनौती है.
इतिहासकार मानते हैं कि अगर अंग्रेज़ों ने आगरा से काफी कुछ लूटा था तो उन्होंने ताज महल को काफी कुछ दिया भी है. मसलन, आज जो मुख्य द्वार है उससे अन्दर दाख़िल होते हे जो फ़व्वारे और रेतीले लाल पत्थर हैं, उनका निर्माण लार्ड कर्ज़न ने कराया था. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि अगर अंग्रेज़ न होते तो शायद ताज महल को काफी ज़्यादा नुकसान पहुंचा होता. उन्होंने 1920 के आस-पास से ही ताज महल और दूसरे धरोहरों का संरक्षण शुरू कर दिया था.
ऐसे कई शिलालेख मौजूद हैं जो इस बात को साबित करते हैं. जगंज ताजमहल की सीमा के अंदर ही बसा हुआ है. ये वो इलाक़ा है जहां ताजमहल को तामीर करने वाले फनकार रहा करते थे. अब उनके वंशज यहाँ रहते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने ताजगंज के रहने वाले हर व्यक्ति को जीता जागता धरोहर मान लिया है.
यहाँ के मकान और यहाँ के लोग – सभी ताज महल के जैसे ही धरोहर हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट की इस मान्यता से लोग इसलिए खुश नहीं हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि संरक्षण के नाम पर जो कानून बनाए गए हैं, बाबुओं ने वो सब सिर्फ ताजगंज पर थोप दिए हैं.
संदीप अरोड़ा इनमें से एक हैं. वो कहते हैं कि धरोहर के नाम पर अगर उनके घर का कमोड भी टूटता है तो वो उसे बिना इजाज़त बनवा नहीं सकते. वो डीजल के जेनरेटर नहीं लगा सकते जबकि आगरा शहर के बड़े होटलो में बड़े-बड़े डीज़ल जेनरेटर लगे हुए हैं.
वो कहते हैं “सुप्रीम कोर्ट ने डीज़ल के वाहनों पर पाबंदी लगाई है. मगर ताजगंज के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पास की व्यवस्था करने को कहा है जिससे यहाँ रहने वालों को कोई तकलीफ़ नहीं हो. मगर हमने यातायात विभाग से जानकारी जुटाई तो पता चला कि यहाँ के लोगों को 170 पास दिए गए हैं जबकि प्रशानिक अधिकारियों, नेताओं और उनके रिश्तेदारों को 5000 से भी ज्यादा पास बाँटे गए हैं. वो डीज़ल की गाड़ियों से ताजमहल के दरवाज़े तक आते हैं जबकि ये प्रतिबंधित है.”
संदीप के अनुसार जो पर्यटक विदेश से आते हैं वो ज्यादा पैसे देते हैं मगर उन्हें सुविधा कुछ नहीं मिलती. जो तकलीफ़ वो उठाते हैं तो फिर दोबारा नहीं आने के प्रण के साथ लौट जाते हैं.
गी.”
इसको बचाने के अलग-अलग तरीक़े सुझाए जाते हैं. कोई हेरिटेज सिटी बनाने से मामले का हल देखता है तो कोई यमुना में पानी के आ जाने और कचरा साफ़ करने से.
मगर इमारत को कैसे बचाया जाए इस पर अभी तक शोध चल रहा है. हालाँकि इसकी मरम्मत समय-समय पर होती रहती है. मगर जिस तरह से मरम्मत हो रही है वो सवाल खड़े करती है.
आगरा गाइड एसोसिएशन के अध्यक्ष शम्सुद्दीन कहते हैं कि ताजमहल कैसे बचेगा, ये ताजगंज का बच्चा-बच्चा जानता है. सिर्फ अधिकारी ही नहीं जान पाए हैं.
शम्सुद्दीन ने अपनी उम्र में पचास राष्ट्राध्यक्षों को ताज महल में बतौर गाइड घुमाया है जिसमे श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति जयवर्धने से लेकर इसराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू तक शामिल हैं.
उनका कहना है, “यहाँ पर एक बड़ी जमात है जिसको हम पच्चीकार कहकर बुलाते हैं. यही वो लोग हैं जिनके पूर्वजों ने ताजमहल के निर्माण के दौरान काम किया था. ये हस्तशिल्प कलाकार हैं जो वही नक्काशी करते हैं जो आपको ताजमहल में देखने को मिलेगी. ताज महल को बचाएगा कौन ? नस्ल ही तो बचाएगी. मगर सरकार ने इनकी कला को संरक्षित करने या फिर दूसरे लोगों को ये कला सिखाने की कोई पहल नहीं की है.”
इन तमाम चर्चाओं के बाद पुरातत्व वैज्ञानिक आरके दीक्षित कहते हैं कि जिस दिशा में ताजमहल का संरक्षण जा रहा है,अफ़सोस होगा कि आने वाली नस्लों के लिए कुछ नहीं बचेगा क्योंकि समय तेज़ी से निकल रहा है.
वर्ष 1984 से अदालत में लड़ने वाले वकील एमसी मेहता को नहीं लगता कि ताज महल को बचाने की दिशा में अब कुछ हो पाएगा. इसकी संभावनाएं अब नहीं के बराबर ही हैं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अब 22 साल हो गए हैं.
मेहता कहते हैं, "पहली चुनौती है कि ये विश्व धरोहर बना रहे क्योंकि यूनेस्को की टीम ऐसी इमारतों का अवलोकन करती रहती हैं और ताज महल तेज़ी से इस पायदान से नीचे उतरता जा रहा है. दूसरी चुनौती है कि वो दुनिया के सात अजूबों में से एक बना रहे. अब इसकी भी संभावनाएं कम होती चली जा रहीं हैं जो दुर्भाग्यपूर्ण है और जिसके लिए केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश की सरकार और पुरातत्व विभाग ज़िम्मेदार हैं."
एम सी मेहता का कहना है: "मेरी लड़ाई 1984 से भी पहले की है. 1984 में तो मैंने याचिका डाली थी. दिल्ली से लेकर बटेश्वर तक यमुना के किनारे पर हमारी ऐतिहासिक धरोहर बसती है - चाहे वृन्दावन हो या आगरा. ताज महल पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला 1996 में आया. ये फ़ैसला अपने आप में ताज महल के संरक्षण का 'रोड मैप' है. सरकार अगर फ़ैसले पर अमल करती तो आज स्थिति इतनी ख़राब नहीं होती."
उनका कहना है कि ताज महल ज़मींदोज़ होने या गिर जाने से बच जाए; यही सबसे बड़ी उपलब्धि होगी. जिस तरह ताज की नींव कमज़ोर होती जा रही है और जिस तेज़ी के साथ मुख्य इमारत में दरारें पड़ रहीं हैं, वो दिन दूर नहीं है जब ताज महल सिर्फ इतिहास में सिमटकर रह जाएगा. इसे बचाने के लिए वक़्त हाथों से निकल चुका है. ख़ुद मेहता को भी यही उम्मीद है कि उनकी बात सही साबित न हो.

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